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न्यायालय की अवमानना मामला: प्रशांत भूषण भरेंगे जुर्माना, पुनर्विचार याचिका दायर करने के भी दिये संकेत

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वकील प्रशांत भूषण (Advocate Prashant Bhushan) ने कहा, “यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए एक ऐतिहासिक क्षण (watershed moment) है और लगता है कि कई लोगों को अन्याय के खिलाफ बोलने (speak out against injustices) के लिए प्रोत्साहित किया है.”

नई दिल्ली. न्यायालय की अवमानना (contempt of court) के मामले में दोषी पाये गये मशहूर वकील प्रशांत भूषण (Advocate Prashant Bhushan) ने अपने मामले को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए एक ऐतिहासिक क्षण (watershed moment) कहा है. साथ ही उन्होंने यह दावा भी किया है कि इसने कई लोगों को अन्याय के खिलाफ बोलने के लिए प्रोत्साहित किया (encouraged many people to speak out against injustices) है. इसके अलावा उन्होंने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, “मैं पुनर्विचार याचिका दायर करने के अपने अधिकार को सुरक्षित रखता हूं, उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) के निर्देश के अनुसार जुर्माना (fine) अदा करने का प्रस्ताव करता हूं.”

वकील प्रशांत भूषण ने कहा, “मेरे ट्वीट सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) के निरादर के इरादे से नहीं किये गये थे बल्कि उन्हें मैंने असली मुद्दों से विचलित होने पर अपना गुस्सा (anguish) व्यक्त करने के इरादे से किया था, यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए एक ऐतिहासिक क्षण (watershed moment) है और लगता है कि कई लोगों को अन्याय के खिलाफ बोलने (speak out against injustices) के लिए प्रोत्साहित किया है.” इससे पहले उन्होंने बताया था कि उनके वकील (advocate) और वरिष्ठ साथी राजीव धवन ने दोषी पाए जाने के फैसले के तुरंत बाद ही उन्हें जुर्माना (fine) भरने के लिए 1 रुपया दिया था जिसे उन्होंने आभारपूर्वक स्वीकार लिया था.

अवमानना के दोषी पाये जाने पर SC ने एक रुपए का सांकेतिक जुर्माना लगाया
बता दें कि उच्चतम न्यायालय ने न्यायपालिका के प्रति अपमानजनक ट्वीट करने के कारण आपराधिक अवमानना के दोषी अधिवक्ता प्रशांत भूषण को सोमवार को सजा सुनाते हुये उन पर एक रुपए का सांकेतिक जुर्माना किया. न्यायमूर्ति अरूण मिश्रा, न्यायमूर्ति बी आर गवई और न्यायमूर्ति कृष्ण मुरारी की तीन सदस्यीय पीठ ने दोषी अधिवक्ता प्रशांत भूषण को सजा सुनाते हुये कहा कि जुर्माने की एक रुपए की राशि 15 सितंबर तक जमा नहीं करने पर उन्हें तीन महीने की कैद भुगतनी होगी और तीन साल के लिये वकालत करने पर प्रतिबंध रहेगा. पीठ ने अपने फैसले में कहा कि अभिव्यक्ति की आजादी बाधित नहीं की जा सकती लेकिन दूसरों के अधिकारों का भी सम्मान करने की आवश्यकता है.

न्यायालय ने फैसले में कहा कि न सिर्फ पीठ ने भूषण को अपने कृत्य पर खेद प्रकट करने के लिये कहा बल्कि अटॉर्नी जनरल के के वेणुगोपाल की भी राय थी कि अवमाननाकर्ता को खेद प्रकट कर देना चाहिए. भूषण ने इन ट्वीट के लिये उच्चतम न्यायालय से क्षमा याचना करने से इंकार करते हुये अपने बयान में कहा था कि उन्होंने वही कहा जिस पर उनका भरोसा है.