Home देश-विदेश क्या डेमोक्रेट्स की जीत से लटक जाएगी भारत-अमेरिका ट्रेड डील?

क्या डेमोक्रेट्स की जीत से लटक जाएगी भारत-अमेरिका ट्रेड डील?

2
0

अमेरिका में हुए इलेक्‍शन में डोनाल्‍ड ट्रंप को हार का सामना करना पड़ा है. डेमोक्रेट्स की जीत के बाद सवाल यह है कि क्या अब भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित अंतरिम व्यापार समझौता लटक जाएगा? मनीकंट्रोल की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता पर तत्काल असर पड़ने की आशंका नहीं है, लेकिन चुनाव के परिणाम मुख्य रूप से यह तय करेंगे कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को अपनी आक्रामक टैरिफ नीतियों को आगे बढ़ाने और किसी व्यापक व्यापार समझौते के लिए विधायी समर्थन हासिल करने में कितनी राजनीतिक छूट मिल पाती है.
ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) के संस्थापक अजय श्रीवास्तव द्वारा तैयार रिपोर्ट के अनुसार, मध्यावधि चुनावों में लगे झटके के बाद ट्रंप प्रशासन अपनी बातचीत की ताकत और प्रशासनिक क्षमता साबित करने के लिए भारत के साथ व्यापार समझौते को तेजी से अंतिम रूप देने की कोशिश कर सकता है. दूसरी ओर भारतीय उद्योग जगत का मानना है कि चुनावी नतीजों से बातचीत की दिशा में तत्काल किसी बड़े बदलाव के आसार नहीं हैं. एक इंडस्‍ट्री रिप्रजेंटेटिव ने कहा कि ट्रंप राजनीतिक रूप से इतने मजबूत हैं कि वे कांग्रेस और सीनेट दोनों को दरकिनार करने की क्षमता रखते हैं. हालांकि, कुछ फैसलों का असर सीमित हो सकता है, लेकिन व्यापार समझौते की रफ्तार में अचानक तेजी आने की संभावना भी कम ही है.

क्लोदिंग मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (CMAI) के चीफ मेंटर राहुल मेहता का कहना है कि उद्योग जगत इन नतीजों के असर पर नजर रखे हुए है. लेकिन, मिडटर्म चुनाव में डेमाक्रेट्स की जीत और ट्रंप की पार्टी की हार से भारत और अमेरिका के बीच द्विपक्षीय व्यापार वार्ता पटरी से उतरने की आशंका नहीं है. मेहता ने कहा, “उद्योग जगत इंतजार कर रहा है और देख रहा है कि अमेरिकी मिडटर्म चुनावों का वास्तव में क्या असर पड़ता है. हालांकि, हमारा मानना है कि इस घटनाक्रम से व्यापार समझौता प्रभावित नहीं होना चाहिए.”

वहीं, एक अन्य अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि साझीदार देशों पर दबाव बनाने की ट्रंप की क्षमता इस बात पर टिकी होगी कि चुनाव के बाद उनकी घरेलू राजनीतिक स्थिति कितनी मजबूत रहती है. यदि वे मजबूत बने रहे तो दबाव बनाने के वैकल्पिक रास्ते इस्तेमाल किए जाते रहेंगे.

क्या भारत को मिल रहा है बराबरी का फायदा?
GTRI के विश्लेषण के मुताबिक, मिडटर्म चुनाव में झटका लगने के बावजूद अमेरिका की संरक्षणवादी व्यापार नीति में बदलाव की संभावना बेहद कम है. अमेरिका में आर्थिक राष्ट्रवाद, घरेलू विनिर्माण और सुरक्षित सप्लाई चेन जैसे मुद्दों पर रिपब्लिकन और डेमोक्रेट दोनों दलों की राय एक जैसी है. ऐसे में रूस, चीन और ईरान के मोर्चे पर विदेश नीति संबंधी चुनौतियों के बीच ट्रंप भारत पर जल्दी समझौता करने का दबाव बढ़ा सकते हैं.

हालांकि, रिपोर्ट में प्रस्तावित भारत-अमेरिका व्यापार ढांचे की संरचना पर गंभीर चिंता जताई गई है. यह ढांचा पारंपरिक मुक्त व्यापार समझौतों (FTA) से काफी अलग है.
ज्यादातर व्यापार समझौतों के तहत दोनों देश एक-दूसरे के लिए आयात शुल्क कम करते हैं या खत्म करते हैं. लेकिन प्रस्तावित भारत-अमेरिका ढांचे के तहत वॉशिंगटन अपने सामान्य मोस्ट फेवर्ड नेशन (MFN) टैरिफ बरकरार रखेगा, जबकि भारत से अमेरिकी औद्योगिक और कृषि उत्पादों की एक बड़ी श्रेणी पर आयात शुल्क कम करने या खत्म करने की अपेक्षा की जाएगी.

6 फरवरी के संयुक्त बयान के तहत भारत ने वॉशिंगटन के साथ आर्थिक व सुरक्षा नीतियों में तालमेल बिठाने, 5 वर्षों में 500 अरब डॉलर के अमेरिकी सामान खरीदने और नियामकीय बाधाएं घटाने की प्रतिबद्धता जताई है. GTRI का कहना है कि इन भारी रियायतों के बदले भारत को कानूनी रूप से लागू होने वाले समान लाभ नहीं मिल रहे हैं. समझौते के बाद भी भारत पर सामान्य एमएफएन शुल्क के अलावा 15 से 18 फीसदी तक अतिरिक्त टैरिफ का जोखिम बना रह सकता है.

क्या अंतरिम समझौते को अमेरिकी कांग्रेस की मंजूरी लेनी होगी?
इस समझौते की कानूनी वैधता इस बात पर निर्भर करेगी कि इसे किस रूप में लागू किया जाता है. 6 फरवरी के संयुक्त बयान में केवल एक अंतरिम रूपरेखा की घोषणा की गई थी, जिसमें आगे चलकर व्यापक द्विपक्षीय समझौते पर बातचीत जारी रखने की बात कही गई थी. अमेरिकी संविधान के तहत विदेशी व्यापार को नियंत्रित करने और टैरिफ लगाने का अधिकार कांग्रेस के पास है, जबकि बातचीत का जिम्मा राष्ट्रपति संभालते हैं. पारंपरिक रूप से इसके लिए ट्रेड प्रमोशन अथॉरिटी का इस्तेमाल होता था, जिसकी अवधि 1 जुलाई 2021 को ही समाप्त हो चुकी है और इसे रिन्यू नहीं किया गया है.
कब होगी कांग्रेस की सहमति की जरूरत
यदि समझौते को लागू करने के लिए अमेरिकी कानूनों में संशोधन या टैरिफ में नई रियायतें देनी हैं, तो इसे अमेरिकी कांग्रेस से पारित कराना अनिवार्य होगा, जहां अब डेमोक्रेट्स का प्रभाव है. बिना विधायी मंजूरी के केवल कार्यकारी स्तर पर किया गया समझौता प्रशासन के मौजूदा अधिकारों तक ही सीमित रहेगा और भविष्य के राजनीतिक फैसलों पर निर्भर करेगा. ऐसे में किसी स्थायी और व्यापक व्यापार समझौते के लिए लंबी विधायी प्रक्रिया से गुजरना ही होगा.

भारतीय सामानों पर 100% टैरिफ का खतरा बरकरार
डेमोक्रेट्स के प्रभाव वाली कांग्रेस भले ही ट्रंप की विधायी शक्तियों पर लगाम लगाए, लेकिन भारतीय निर्यातकों के सिर पर एक पुराना कानून अब भी तलवार बनकर लटक रहा है. 18 सितंबर को लागू हुआ लिंडसे ओ ग्राहम सैंक्शनिंग रूस एंड ईरान एक्ट राष्ट्रपति को यह अधिकार देता है कि वे रूस से कच्चा तेल या गैस खरीदने वाले देशों के उत्पादों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगा सकें.

रूस से बड़े पैमाने पर कच्चा तेल खरीदने के कारण भारत इस कानून के सीधे दायरे में आता है. सबसे बड़ी चिंता यह है कि यह दंडात्मक शुल्क केवल ऊर्जा क्षेत्र तक सीमित न रहकर भारत से अमेरिका जाने वाले सभी तरह के सामान पर लगाया जा सकता है. यद्यपि ट्रंप ने 16 अक्टूबर को एक कार्यकारी आदेश के जरिए राष्ट्रीय हित का हवाला देकर भारत को इन प्रतिबंधों से फौरी छूट दे दी थी, लेकिन प्रशासन के पास किसी भी समय इस छूट की समीक्षा करने का अधिकार सुरक्षित है.

सुप्रीम कोर्ट के फैसले से कम हुआ दबाव
टैरिफ को हथियार बनाकर दबाव बनाने की अमेरिकी रणनीति को उसके अपने ही सुप्रीम कोर्ट से झटका लगा है. 20 फरवरी को अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट (IEEPA) राष्ट्रपति को मनमाने तरीके से टैरिफ लगाने का अधिकार नहीं देता. GTRI के अनुसार, इस फैसले से अमेरिका का वह प्रमुख साधन कमजोर हो गया है जिसके दम पर वह यूरोपीय संघ, जापान, ब्रिटेन, दक्षिण कोरिया और भारत जैसे देशों पर जवाबी टैरिफ घटाने के बदले रियायतें देने का दबाव बना रहा था.

WTO नियमों का उल्लंघन बन सकता है भारत के लिए नया सिरदर्द
द्विपक्षीय चिंताओं के साथ-साथ यह प्रस्तावित समझौता विश्व व्यापार संगठन (WTO) के मंच पर भी भारत के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकता है. अंतरराष्ट्रीय व्यापार नीति विशेषज्ञ अभिजीत दास के मुताबिक, यदि भारत केवल अमेरिकी उत्पादों को विशेष या शून्य आयात शुल्क की छूट देता है और बाकी सदस्य देशों को यह सुविधा नहीं देता, तो यह विश्‍व व्‍यापार संगठन के मोस्ट फेवर्ड नेशन (MFN) सिद्धांत का सीधा उल्लंघन होगा.

यद्यपि डब्ल्यूटीओ नियमों के तहत व्यापक मुक्त व्यापार समझौतों (FTA) में ऐसी छूट देने का प्रावधान है, लेकिन जीटीआरआई का तर्क है कि भारत-अमेरिका की प्रस्तावित व्यवस्था इस कसौटी पर खरी नहीं उतरती क्योंकि वॉशिंगटन अपने एमएफएन टैरिफ में समान कटौती नहीं कर रहा है. पारस्परिक कटौती के बिना अमेरिकी उत्पादों को एकतरफा बाजार पहुंच देने से भारत अंतरराष्ट्रीय व्यापार विवादों में घिर सकता है और उसकी वैश्विक साख प्रभावित हो सकती है.
GTRI ने सरकार को आगाह किया है कि वह टैरिफ की धमकियों से मिली अस्थायी राहत को संतुलित व्यापार समझौता न माने. भारत को चाहिए कि वह कानूनी रूप से बाध्यकारी पारस्परिक लाभ, WTO नियमों की अनुकूलता और अपनी ऊर्जा व विकास संबंधी प्राथमिकताओं की सुरक्षा को प्राथमिकता दे, ताकि पूरी व्यवस्था अमेरिकी प्रशासन की बदलती प्राथमिकताओं की मोहताज न रहे.