छत्तीसगढ़ के दो सबसे बड़े अस्पतालों में कैंसर के इलाज को लेकर मरीजों को दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। डॉ. भीम राव अंबेडकर अस्पताल में पेट सीटी व गामा मशीन इंस्टाल हो चुकी है। 16 करोड़ की यह मशीन है, लेकिन शुरू नहीं की जा सकी। इसका कारण ये है, कि इसकी खरीदी की प्रशासकीय स्वीकृति नहीं हुई थी और इसे खरीदा गया था।
अब डॉक्टर कागजी औपचारिकताओं के कारण इसे शुरू नहीं कर पा रहे और मशीन यूं ही खराब होती जा रही है। उधर, डीकेएस हॉस्पिटल में एकमात्र बोन मैराे ट्रांसप्लांट विशेषज्ञ ने इस्तीफा दे दिया, जिसके बाद से विभाग ही बंद हो गया। अब ब्लड कैंसर के मरीज को दूसरे अस्पतालों में भेजा जा रहा है। ब्लड कैंसर के इलाज के लिए सरकारी अस्पतालों में यह एक मात्र आशा थी। इन वजहों से कैंसर के मरीज परेशान हैं।
निजी में जांच का खर्च 20 हजार रु. तक, आयुष्मान में मुफ्त जांच होती
पेट सीटी स्कैन मशीन 12 करोड़ व गामा मशीन 4 करोड़ की है। दोनों ही मशीन कैंसर सस्पेक्ट या मरीजों के लिए जरूरी है। कैंसर विभाग की ओपीडी में रोज 250 से ज्यादा आते हैं। 18 से 20 को पेट सीटी जांच की सलाह दी जाती है। यहां से उन्हें एम्स भेजा जा रहा, लेकिन यहां भीड़ बहुत है। निजी अस्पतालों में इसके लिए 20 हजार तक खर्च करना पड़ रहा है। ये भी प्रस्ताव है कि अंबेडकर में भर्ती मरीज की जांच के लिए आयुष्मान कार्डधारी से कोई शुल्क न लिया जाए।
जिनके पास कार्ड नहीं, उन्हें10 हजार
जिनके पास आयुष्मान कार्ड नहीं है, उनके लिए शुल्क तय किया गया था। बीपीएल के लिए करीब 10 हजार व एपीएल के लिए करीब 15 हजार शुल्क है। दोनों मिलाकर 98 फीसदी लोगों के पास कार्ड हैं।
मशीन की वारंटी भी खत्म हो चुकी
इस मशीन की वारंटी भी फरवरी 2022 में खत्म हो चुकी है, लेकिन एक भी मरीज की जांच मशीन से नहीं हो सकी। अब यदि मशीन खराब होती है तो इसका पूरा खर्च अस्पताल को ही उठाना पड़ेगा।
जानिए,क्या है पेट सीटी मशीन
पेट (पॉजीट्रॉन इमीशन टोमोग्राफी) रेडियो एक्टिव पदार्थ की इमेजिंग करती है। इससे लिंफोमा, ब्रेन कैंसर, गले का कैंसर, सिर व गर्दन का कैंसर, लंग कैंसर का पता भी लगाया जा सकता है।
मशीन क्यों शुरू नहीं की जा रही है, इस पर अधिकारियों से बात की जाएगी। यह कैंसर मरीजों के लिए बेहद महत्वपूर्ण मशीन है।
आर. प्रसन्ना, स्वास्थ्य सचिव, छत्तीसगढ़
इधर, अब ब्लड कैंसर के मरीज के लिए कोई सरकारी डॉक्टर नहीं
ब्लड कैंसर विशेषज्ञ अंबर गर्ग ने डीकेएस से 13 दिन पहले इस्तीफा दे दिया। उन्होंने रेेगुलर करने की मांग की थी, लेकिन नहीं हुए तो नासिक चले गए। अब यह विभाग ही बंद हो गया है। यहां के जो मरीज इलाज करा रहे थे, उन्हें अंबेडकर व एम्स भेजा गया। निजी अस्पतालों में ओपीडी का खर्च ही 700 रुपए है, जो डीकेएस में 10 रु. था। इलाज तो बहुत ही अधिक महंगा है। प्राइवेट में बोन मेरो ट्रांसप्लांट का 10 लाख तक है, जो डीकेएस में फ्री में होता।
रोजाना 32 से 35 मरीज आते थे
डीकेएस में रोज 32 से 35 मरीज तक आते थे। इस्तीफे के बाद बोन मैरो ट्रांसप्लांट तो होने से रहा, अब ब्लड संबंधी रोगों के इलाज के मरीजों की परेशानी बढ़ गई है। नए डॉक्टर की संभावना कम है।
15 बेड का वार्ड था डीकेएस में
ब्लड कैंसर के मरीजों के लिए डीकेएस में 15 बेड का वार्ड था। अब यह भी बंद हो गया है। डॉक्टर के इस्तीफे के बाद 6 से 7 मरीजों को अंबेडकर अस्पताल व एम्स रिफर किया गया। ताकि उनका इलाज हो।
निजी अस्पताल में लाखों का खर्च
ब्लड कैंसर से संबंधित बीमारियों की जांच और इलाज में लाखों का खर्च होता है। यह कैंसर के स्टेज पर निर्भर है। डीकेएस में यही जांच और इलाज मुफ्त में होता, यदि आयुष्मान कार्ड मरीज के पास हो।
इस्तीफे के बाद ब्लड कैंसर के इलाज के लिए कोई डॉक्टर नहीं है। नए डॉक्टर की तलाश की जा रही है। इसके बाद मरीजों की भर्ती की जाएगी।
डॉ. हेमंत शर्मा, उप अधीक्षक, डीकेएस



