घरेलू इस्पात इंडस्ट्री ने आगामी बजट में एंथ्रेसाइट कोयला (Anthracite Coal), मेटालर्जिकल कोक (Metallurgical Coke), कोकिंग कोयला (Coking Coal) और ग्रेफाइट इलेक्ट्रॉड (Graphite Electrode) जैसे कच्चे माल पर मूल सीमा शुल्क (Customs Duty) में कटौती की मांग की है.
घरेलू इस्पात इंडस्ट्री ने आगामी बजट में एंथ्रेसाइट कोयला (Anthracite Coal), मेटालर्जिकल कोक (Metallurgical Coke), कोकिंग कोयला (Coking Coal) और ग्रेफाइट इलेक्ट्रॉड (Graphite Electrode) जैसे कच्चे माल पर मूल सीमा शुल्क (Customs Duty) में कटौती की मांग की है. उद्योग मंडल सीआईआई (CII) ने इस्पात क्षेत्र को लेकर आगामी बजट के लिए दी गयी सिफारिशों में कहा कि बेहतर गुणवत्ता और मात्रा में इन वस्तुओं की पर्याप्त उपलब्धता नहीं होने से इस्पात उद्योग की बढ़ोतरी पर प्रभाव पड़ता है.
मूल सीमा शुल्क 2.5 फीसदी को घटाकर शून्य करने का सुझाव
उद्योग जगत ने एंथ्रेसाइट कोयला पर मौजूदा मूल सीमा शुल्क 2.5 फीसदी को घटाकर शून्य करने का सुझाव दिया है. उसने कहा कि देश में अच्छी गुणवत्ता में इन उत्पादों की उपलब्धता घट रही है. ऐसे में इस्पात उद्योग को नियमित आधार पर इन वस्तुओं के आयात पर निर्भर होना पड़ सकता है.
सीआईआई ने मेटालर्जिकल कोक के लिये आयात शुल्क मौजूदा 5 फीसदी से कम कर 2.5 फीसदी करने का सुझाव दिया. उद्योग मंडल ने कहा, कम राख वाले मेटालर्जिकल कोक (एच एस कोड 2704) स्टील बनाने के लिये प्रमुख कच्चा माल हैं. कच्चे माल की कुल लागत में इसकी हिस्सेदारी 46 फीसदी है. शुल्क में कटौती से घरेलू इस्पात उद्योग को लागत के हिसाब से प्रतिस्पर्धी होने में मदद मिलेगी.
अपनी सिफारिशों में सीआईआई ने कोकिंग कोयले पर भी आयात शुल्क कम करने का सुझाव दिया है. फिलहाल कोकिंग कोल पर आयात शुल्क 2.5 फीसदी है. उद्योग मंडल ने कहा कि कोकिंग कोयले की घरेलू आपूर्ति पर्याप्त नहीं है. इसीलिए घरेलू जरूरतों को पूरा करने के लिये, इसका आयात करना होता है. इस पर शुल्क घटाकर शून्य किया जाना चाहिए.
उच्च शुल्क से कंपनियों की लागत बढ़ती है
सीआईआई के अनुसार ग्रेफाइट इलेक्ट्रोड का भी इस्पात बनाने में काफी उपयोग होता है. घरेलू इस्पात उत्पादक कंपनियां ग्रेफाइट इलेक्ट्रोड का आयात करने के लिये बाध्य हैं क्योंकि देश में जो भी उत्पादन होता है, उसका करीब 60 फीसदी निर्यात हो जाता है. इससे घरेलू बाजार में इसकी कमी है. उद्योग मंडल ने कहा, उच्च शुल्क से कंपनियों की लागत बढ़ती है. ऐसे में इसे मौजूदा 7.5 फीसदी से घटाकर शून्य स्तर पर लाने की जरूरत है.



